Saturday, September 27, 2014

सूफी बाबा एक परिचय


       
     " ना हम हिंदू , मुस्लिम , सिख हैं , ना ईसाईयत की बातें करते हैं .
              बेटे आदम के मनु वंशी हैं , आदमियत की बातें करते हैं .
              फिरका , मज़हब , जात मिटाकर , आदमियत का राज बतलाने को
              हम सूफी प्यार मोहब्बत से , रूहानियत की बातें करते हैं . "

सूफी बाबा ( सूफी सिगबतुल्ला कलंदर तबरेजी ) का जन्म बिहार के चम्पारण जिले में 1930 में हुआ था .. 1962 ई . में वे परमज्ञान को उपलब्ध हुए . पानीपत के प्रसिद्ध  कलंदर ' बू-अली शाह ' जी के शिष्य  सूफी संत  ' गौस-अली शाह ' कलंदर के वे उत्तराधिकारी हुए , और विश्व भर के सूफियों के वे सर्वाधिक सम्मानीय कलंदर हैं . और  शरीर छोड़ने के पहले उन्होंने प्यारे सद्गुरु जी (श्री ओशो सिद्धार्थ जी ) को  " औलिया " पद से नवाजा है . अर्थात अब सूफी मिस्टिक ग्रुप इस विश्व के मंगल के लिए प्यारे सद्गुरु जी के माध्यम से काम कर रहा है  .
     क्योंकि प्यारे सूफी बाबा जगत के लिए अनजान ही बने रहे . इसलिए ओशोधारा के ' त्रिदंडी स्वामी ' (ओशो मयूर , स्वामी प्रेम  वरदान, स्वामी आनंद वैभव ) स्वामी प्रेम वरदान जी का उनके लिए अहोभावमय संस्मरण  आपके समक्ष प्रस्तुत हैं .
  चितवन आश्रम नेपाल में पहली बार प्यारे सद्गुरु ( श्री ओशो सिद्धार्थ ) जी के अधरों पर एक प्यारा सा नाम आया - प्यारे-प्यारे सूफी " बाबा शाह कलंदर " जी का . इस नाम का उच्चारण करते हुए सद्गुरु जी की प्रेम विह्वलता ने मुझमें ऐसी उत्सुकता जगा दी कि बरबस मन  ' सूफी बाबा ' के दर्शन के लिए बेचैन रहने लगा . मिलने की यह प्यास बढ़ती रही , चेष्टा की , गिरडीह गया , पर ' सूफी बाबा ' के दरवाजे  से वापस लौटा दिया गया .
     मुझे क्या पता था जिसने प्यास बढाई है वही प्यास बुझायेगा . 14 जुलाई को बचड़ा , झारखंड में , मैं और मेरे अभिन्न मित्र स्वामी ओशो मयूर और स्वामी आनंद वैभव हम तीनों मित्रों ने निर्णय लिया कि हम भी रांची चलें और सद्गुरु से प्रार्थना करें कि वे हमें साथ ले जाकर ' सूफी बाबा ' का दर्शन कराएं . और सद्गुरु जी ने बड़ी सहजता से हमारी प्रार्थना स्वीकार कर ली . और हमारा काफिला हमारे फोटोग्राफर मित्र श्री संजीव के साथ ' सूफी बाबा ' के दरबार जा पहुंचा .
       मंद चाल से चलते हुए एक दिव्य पुरुष जिनके चेहरे पर बाल सुलभ हास्य था प्रकट हुए . सद्गुरु और सूफी बाबा में प्रकटतः कोई संवाद नहीं सुना , पर दिल भीतर ही भीतर गा उठा " दो सितारों का मिलन है आज की रात ."
    सद्गुरु जी ने सभी का परिचय सूफी बाबा से करवाया और सूफी बाबा ने जवाब में एक शेर पढ़ा - " हर शक्ल में आईना है और आईने में तू है . " सद्गुरु जी ने हर युग में संतों के सताए जाने की बात कही . इस पर सूफी बाबा ने हँसते हुए कहा कि " संत अगर सताए न जाएं तो उनके गुणों में निखार कहां से आये ? सूफी बाबा ने कहा कि फूल और तिल पिसे बिना गंध और तेल नहीं देते  वैसे ही संत अगर न सताए जाएं तो निखार कहां ?
    सद्गुरु जी ने आतंकवाद के बारे में पूंछा , तो हंसते हुए उन्होंने कहा कि वे भी तो वही हैं और एक शेर पढ़ा - " इब्तिदाए इश्क में रोता है क्या , आगे-आगे देखिये होता है क्या . " उन्होंने आगे कहा कि दुनिया के सारे संत सताए गए और हिन्दुस्तान में पैदा होने वाला हर एक आदमी धार्मिक है .  सूफी बाबा फोटो नहीं खिचवाते थे . पर सद्गुरु के निवेदन पर ओशोधारा के लिए उन्होंने अपना फोटो खीचने की आज्ञा दे दी . उन्होंने कहा कभी भी अपने शयन कक्ष में अपने गुरु की या किसी भी संत की तस्वीर मत लगाना . तस्वीर भी जागृत होती है और इसे संसारी के शयन कक्ष में लगाने पर अनिष्ट होता है . अगर तस्वीर को शयन कक्ष में ही लगाने की मजबूरी हो तो सोने से पहले उसे साफ़ कपड़े से ढक दो .
      सद्गुरु श्री ओशो सिद्धार्थ जी की तरफ इशारा कर सूफी बाबा ने कहा यह तुम्हारे गुरु जानते हो कौन हैं ? फिर स्थिर हो बोले कि गुरु परमब्रह्म होता है , ब्रह्म से भी ऊपर . बुद्धि रावण है और हृदय राम . पर दोनों के बीच का फासला चाँद का है . तुम्हारी यात्रा रावण से राम तक की यात्रा है यानि बुद्धि से हृदय की तरफ चलना . उन्होंने पुनः कहा कि आत्मज्योति हृदय से ऊपर कंठ में आये तो नीलकंठ और ऊपर सहस्रार पर चढ़े तो ज्योति होगी . इस यात्रा पर तुम्हारा गुरु तुम्हें ले जाता है .
     उन्होंने पुनः कहा कि रात जब सोते हो तो सोचो अपने बारे में . जब पैदा हुए थे तब कोई नाम नहीं था तुम्हारा . तीन दुनियां हैं , तुम , तुम्हारा नाम , जो तुम वास्तव में हो और जो जी रहे हो . हम तो पड़ाव के मुसाफिर हैं , उम्र तो घट रही है रोज . अध्यात्म खुद की जानकारी लेना है . तुम खोजो या जिसने पा लिया उसके पास जाओ . उन्होंने कहा कि बाजा बजाकर मैय्यत क्यों ले जाते हो ? और उत्तर भी उन्होंने दिया कि यह तो मिलन का उत्सव है , पर केवल जानकारों के लिए . 
   दूसरी सुबह हम सभी पुनः तंजिम-ए -सूफिया आश्रम पहुंचे और दरवाजे पर लगे सभी धर्मों के धार्मिक चिन्हों को देखा . एक प्रतीक चिन्ह , सूरज के भीतर एक ओंकार ने सब इशारा कर दिया .
   विदाई की बेला में मैंने बच्चों सा मचल कर सूफी बाबा से पूंछा कि पुनः आने पर आपके दर्शन की इजाजत चाहूंगा . इस पर सूफी बाबा ने हंस कर कहा कि वीरेंद्र (सद्गुरु श्री ओशो सिद्धार्थ ) के शिष्यों का सदा स्वागत है . स्वास्थ्य एवं अन्य कारणों से सूफी बाबा सभी से नहीं मिला करते थे .
    सद्गुरु जी ने बताया - "  कि मुझे उनसे बहुत प्यार था . सूफी बाबा विशेष रूप से विभूति-तंत्र के ज्ञाता थे . मैंने उनसे विभूति-तंत्र सीखा . विशेष रूप से यह विद्या सीखी कि बाहर से आई हुई नकारात्मक शक्तियों से कैसे बचा जाए ? तथा कुछ और भी तांत्रिक शक्तियां सीखनी चाही . सूफी बाबा ने कहा कि वे अपनी सारी शक्तियां धीरे-धीरे मुझमें स्थानांतरित कर देंगे . और अधिकांश शक्तियां उन्होंने मुझे दे दी हैं . और शेष अपना शरीर छोड़ने के पहले तक वे मुझे दे जायेंगे . इस तरह मुझे बिना अधिक साधना किये ही तांत्रिक शक्तियां सूफी बाबा ने भेंट स्वरुप दे दी हैं . और साथ ही उनका निर्देश भी है कि मैं इन शक्तियों का केवल आत्मरक्षा के लिए ही उपयोग करूं . मैंने संकल्प लिया कि ओशोधारा के साधकों या उनके परिवार पर किसी प्रकार का कष्ट आता है तो मैं इन शक्तियों का उपयोग कष्ट निवारण के लिए अवश्य करूंगा . और आज के दिन ऐसी कोई नकारात्मक शक्ति नहीं है जो ओशोधारा को परेशान कर सके . इसके लिए मैं सूफी बाबा का अनुग्रहीत हूं . "
       इस तरह हम  'त्रिदंडी साहब ' (स्वामी प्रेम वरदान , स्वामी ओशो मयूर और स्वामी आनंद वैभव) व अन्य सन्यासी मित्र दो अनुपम सितारों के मिलन के गवाह बने और सद्गुरु की कृपा से सूफी बाबा के दर्शन किये .
 
 - स्वामी प्रेम वरदान (एस . एन . सिंह )