विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 66

[ "मित्र और अजनबी के प्रति , मान और अपमान में , असमता के बीच समभाव रखो ." ]

'असमता के बीच समभाव रखो ', यह आधार है . तुम्हारे भीतर क्या घटित हो रहा है ? दो चीजें घटित हो रही हैं . तुम्हारे भीतर कोई चीज निरंतर वैसी ही रहती है ; वह कभी नहीं बदलती . शायद तुमने इसका निरीक्षण न किया हो ; शायद तुमने अभी इसका साक्षात्कार न किया हो . लेकिन अगर निरीक्षण करोगे तो जानोगे कि तुम्हारे भीतर कुछ है जो निरंतर वही का वही रहता है . उसी के कारण तुम्हारा एक व्यक्तित्व होता है . उसी के कारण तुम अपने को केंद्रित अनुभव करते हो ; अन्यथा तुम एक अराजकता हो जाओगे . तब तुम देख सकते हो कि मित्र में अजनबी है और अजनबी में मित्र है .और तब तुम ' असमता के बीच समभाव ' रख सकते हो . परिधि पर तुम बदलते रहते हो , लेकिन केन्द्र पर , प्राणों में वही बने रहते हो .

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