विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 43

["मुंह को थोड़ा-सा खुला रखते हुए मन को जीभ के बीच में स्थिर करो . अथवा जब सांस चुपचाप भीतर आये , हकार ध्वनि को अनुभव करो ."]

 मुंह को बंद नहीं , थोड़ा-सा खुला रखना है-- मानो तुम बोलने वाले हो . ऐसा नहीं कि तुम बोल रहे हो ; ऐसा ही कि तुम बोलने जा रहे हो . मुंह को इतना ही खोलो जितना उस समय खोलते हो जब बोलने को होते हो . और तब मन को जीभ के बीच में स्थिर करो . तब तुम्हें अनूठा अनुभव होगा ; क्योंकि जीभ के ठीक बीच में एक केन्द्र है जो तुम्हारे विचारों को नियंत्रित करता है . अगर तुम अचानक सजग हो जाओ और उस केन्द्र पर मन को स्थिर करो तो तुम्हारे विचार बंद जाएंगे . जीभ के ठीक बीच में मन को स्थिर करो--मानो तुम्हारा समस्त मन जीभ में चला आया है . जीभ के ठीक बीच में .
        जीभ में वाणी का , बोलने का केन्द्र है ; और विचार वाणी है . जब तुम सोचते हो , विचार करते हो , तो क्या करते हो ? तुम अपने भीतर बातचीत करते हो . क्या तुम भीतर बात किये बिना विचार कर सकते हो ? तुम अकेले हो ; तुम किसी दूसरे व्यक्ति के साथ बातचीत नहीं कर रहे हो . लेकिन तब भी तुम विचार कर रहे हो . जब तुम विचार कर रहे हो तो क्या कर रहे हो ? तुम अपने भीतर बातचीत कर रहे हो ; तुम अपने साथ बातचीत कर रहे हो और उसमें तुम्हारी जीभ संलग्न है . अगली दफा जब तुम विचार में संलग्न होओ तो सजग होकर अपनी जीभ पर अवधान दो . उस वक्त तुम्हारी जीभ ऐसे कंपित होगी जैसे वह किसी के साथ बातचीत करते समय कंपित होती है . फिर अवधान दो और तुम्हें पता चलेगा कि तरंगें जीभ के मध्य में केंद्रित हैं ; वे मध्य से उठकर पूरी जीभ पर फ़ैल जाती हैं . विचार करना अंतस की बातचीत है . और अगर तुम अपनी पूरी चेतना को , अपने मन को जीभ के मध्य में कर सको तो विचार ठहर जाते हैं.

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