विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 18

(" किसी विषय को प्रेमपूर्वक देखो ; दूसरे विषय पर मत जाओ . यहीं विषय के मध्य में - आनंद .")

क्या तुमने कभी किसी चीज को प्रेमपूर्वक देखा है ? तुम हाँ कह सकते हो , क्योंकि तम नहीं जानते कि किसी चीज को प्रेमपूर्वक देखने का क्या अर्थ  होता है . तुमने किसी चीज को लालसा भरी आँखों से देखा होगा , कामनापूर्वक देखा होगा .वह दूसरी बात है . वह बिलकुल भिन्न , विपरीत बात है . पहले इस भेद को समझो . " दूसरे विषय पर मत जाओ ..." दूसरे विषय पर मत जाओ , एक के साथ ही रहो .  गुलाब के फूल के साथ या अपनी प्रेमिका के चेहरे के साथ रहो . और उसके साथ प्रेमपूर्वक रहो , प्रवाहमान रहो , समग्र हृदय से उसके साथ रहो . और इस विचार के साथ रहो कि मैं अपनी प्रेमिका को ज्यादा सुखी और आनंदित बनाने के लिए क्या कर सकता हूँ .
 " यहीं विषय के मध्य में-- आनंद ." और जब ऐसी स्थिति बन जाए कि तुम अनुपस्थित हो , अपनी फ़िक्र नहीं करते , अपने सुख-संतोष की चिंता नहीं लेते , अपने को पूरी तरह भूल गए हो , जब तुम सिर्फ दूसरे के लिए चिंता करते हो , दूसरा तुम्हारे प्रेम का केन्द्र बन गया है , तुम्हारी चेतना दूसरे में प्रवाहित हो रही है , जब गहन करुणा और प्रेम के भाव से तुम सोचते हो कि मै अपनी प्रेमिका को आनंदित करने के लिए क्या कर सकता हूँ , तब इस स्थिति में अचानक , " यहीं विषय के मध्य में - आनंद" ,अचानक उप-उत्पत्ति की तरह तुम्हें आनंद उपलब्ध हो जाता है . तब अचानक तुम केंद्रित हो गए .

Page - प्रस्तावना 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25
26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50
51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75
76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100
101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112