विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 108

 [ " यह चेतना ही प्रत्येक की मार्गदर्शक सत्ता है , यही हो रहो ." ]

जब भी तुम किसी परिस्थिति में बहुत परेशान होओ और तुम्हें पता न चले कि उसमें से कैसे निकलना है तो सोचो मत , बस गहरे निर्विचार में चले जाओ और अपने अंतर्विवेक को अपना मार्गदर्शन करने दो . शुरू-शुरू में तो तुम्हें भय लगेगा , असुरक्षा महसूस होगी , पर जल्दी ही जब तुम हर बार ठीक निष्कर्ष पर पहुंचोगे , जब तुम हर बार ठीक द्वार पर पहुँच जाओगे , तुममें साहस आ जाएगा और तुम भरोसा करने लगोगे .
     यदि यह भरोसा आता है तो उसे ही मैं श्रद्धा कहता हूं . यह वास्तव में आध्यात्मिक श्रद्धा है , अंतर्विवेक में श्रद्धा . बुद्धि तुम्हारे अहंकार का हिस्सा है . वह तोअपने आप पर ही भरोसा है . जिस क्षण तुम अपने में गहरे उतरते हो , तुम ब्रह्मांड की आत्मा में पहुँच जाते हो . तुम्हारी अन्तःप्रज्ञा परम विवेक का अंश है . जब तुम अपना ही अनुसरण करते हो तो सब कुछ उलझा देते हो और तुम्हें कुछ पता नहीं चलता कि तुम क्या कर रहे हो . तुम अपने को बहुत ज्ञानी समझ सकते हो , पर हो नहीं . ज्ञान तो हृदय से आता है , बुद्धि से नहीं . ज्ञान तुम्हारी आत्मा के अंतरतम से उठता है , मष्तिष्क से नहीं . अपनी खोपड़ी को अलग हटा कर रख दो और आत्मा का स्मरण करो , चाहे वह जहां भी ले जाए . अगर वह खतरे में भी ले जाए क्योंकि वही तम्हारे लिए और तुम्हारे विकास के लिए मार्ग होगा . खतरे से तुम विकसित होओगे और पकोगे  . यदि अंतर्विवेक तुम्हें मृत्यु की ओर ले जाए तो भी उसके पीछे जाओ , क्योंकि वही तुम्हारा मार्ग होगा . उसका अनुसरण करो , उसमें  श्रद्धा करो और उस पर चल पडो .

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